सास मेरी ख़ास और उसकी चुदास

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मेरा नाम दीपक है और मैं जींद का रहने वाला हूं।

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मैं अभी कॉलेज की पढ़ाई कर रहा हूं और अपने फुटबॉल की प्रैक्टिस भी करता हूं। मुझे फुटबॉल खेलने का बहुत शौक है और मेरा कई बार सलेक्शन भी हो चुका है।

जिससे कि मैंने बहुत बड़े लेवल पर फुटबॉल भी खेलना है।

मेरे घर में मेरे पिताजी मां और मेरी बहन हैं। मेरे पिताजी स्कूल में टीचर हैं और वह भी सुबह अपने स्कूल निकल जाते हैं। मेरा नेचर थोड़ा गुस्से वाला है।

यदि कोई भी मुझे कुछ कह देता है तो मुझे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है। इस वजह से मेरे पिताजी मुझे कई बार समझाते रहते हैं और कहते हैं कि तुम्हें फालतू में गुस्सा नहीं करना चाहिए।

मैं उन्हें कहता हूं कि मैं कभी भी फालतू में किसी के साथ झगड़ा नहीं करता हूं।

क्योंकि जब तक कोई व्यक्ति मुझसे गलत बात नहीं करेगा तब तक मैं भी उसे क्यों गलत कहूंगा लेकिन फिर भी वह मुझे समझाते रहते हैं और कहते हैं कि इन सब से कुछ भी नहीं होता तुम सिर्फ अपनी पढ़ाई और अपने खेल पर ध्यान दिया करो। इन सब चीजों में मत पढ़ा करो।

हमारे पड़ोस में एक गुलाटी जी रहते हैं। उनकी और मेरे पिताजी की बहुत ही अच्छी दोस्ती है। और हम लोगों का उठना बैठना भी बहुत है। क्योंकि वह हमारे सामने वाले घर में ही रहते हैं।

इसलिए उनका और पिताजी का हमेशा शाम को उठना बैठना हो जाता है। वह भी एक सरकारी दफ्तर में काम करते हैं।

उनके घर में उनकी पत्नी और उनका एक छोटा लड़का है लेकिन उनकी पत्नी का व्यवहार थोड़ा अटपटा सा रहता है। जब उनके मूड में होता है तो वह बहुत ही अच्छे से बात कर लेती हैं और जब उनका मूड नहीं करता तो वह बिल्कुल भी बात नहीं करते।

जिसकी वजह से कई बार पता भी नहीं चल पाता कि कब उनका मूड अच्छा है और कब उनका मूड खराब है। गुलाटी जी भी जब मुझे मिलते हैं तो वह हमेशा कहते हैं कि तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है।

मैं कहता हूं कि मेरी पढ़ाई अच्छी चल रही है और अभी कुछ दिनों बाद मैं अपने स्पोर्ट्स के सिलसिले में कोलकाता जाने वाला हूं। वह कहने लगे यह तो बहुत ही अच्छी बात है। यह बात मुझे भी उसी दिन पता चली थी

जब मैं कॉलेज गया था और मैं जब घर पहुंचा तो मैंने अपने पिताजी को भी इसके बारे में बताया कि मैं कॉलेज की तरफ से फुटबॉल खेलने के लिए कोलकाता जा रहा हूं। वह बहुत खुश थे और उन्होंने पूछा तुम्हें कुछ पैसों की आवश्यकता तो नहीं है। मैंने उन्हें मना कर दिया।

मैंने कहा, नहीं मुझे पैसों की आवश्यकता बिल्कुल भी नहीं है। क्योंकि हम लोगों के लिए सारी व्यवस्था कॉलेज ने ही की हुई है और यह कहते हुए वह मुझे समझाने लगे की वहां तुम किसी से झगड़ा मत कर लेना।

मैंने उन्हें कहा, नहीं मैं किसी से झगड़ा नहीं करूंगा। आप बिल्कुल निश्चिंत रहिए और कुछ दिनों बाद मैं कोलकाता चला गया और वहां पर हम लोगों ने बहुत ही अच्छे से फुटबॉल खेला और मैं कोलकाता भी घूम रहा था।

क्योंकि मैं पहली बार ही कोलकाता आया था। अब कुछ दिन में हम लोग वहां से अपने घर के लिए वापस आ गए। जब मैं अपने घर आया तो मेरे पिताजी बहुत खुश हुए और वह कहने लगे तुम्हारा कोलकाता का टूर कैसा था। मैंने उन्हें बताया कि बहुत अच्छा था। हम लोगों ने वहां बहुत कुछ सीखा और हम लोग वहां मैच भी जीते।

यह सुनकर वह बहुत ज्यादा खुश थे। मैं भी अपने कॉलेज जाने लगा और मेरे पिताजी भी अपने स्कूल जाते है और शाम को घर वापस आ जाते हैं। तभी एक दिन मुझे गुलाटी जी मिले और उन्होंने पूछा क्या तुम वापस आ गए हो।

मैंने उन्हें बताया, हां मैं वापस आ गया हूं। मैंने उससे पूछा तुम्हारा टूर कैसा रहा। मैंने उन्हें बताया बहुत अच्छा था।

अगले दिन मुझे उनकी पत्नी मिली और वह बिल्कुल भी बात नहीं कर रही थी। मुझे लगा शायद उनको नेचर ही ऐसा है। मैंने इस बारे में अपने घर में बात की तो वह कहने लगे कि वह आप हमसे बात नहीं करती हैं।

मैंने उनसे पूछा ऐसा क्या हो गया जो आप से बात नहीं कर रही हैं। तुम्हारे घर वालों ने बताया कि किसी ने उनके घर के आगे कचरा फेंक दिया था और वह कहने लगे कि आप लोगों ने हमारे घर के आगे कचरा कर दिया है।

जिसकी वजह से वह मेरे पिता जी को बहुत ही अनाप-शनाप कहने लगी और तब से वह लोग बातें नहीं कर रहे हैं। गुलाटी जी भी हमारे घर पर अब नहीं आते।

मुझे बहुत ज्यादा गुस्सा भी आ रहा था लेकिन मैंने अपने गुस्से को काबू कर लिया। मैं भी उनसे बात नहीं करता था। ऐसे ही मेरा कॉलेज और कॉलेज से घर का रूटीन चलता रहता।

एक दिन मैं अपने कॉलेज के लिए जा रहा था तो गुलाटी जी की पत्नी का पैर छत पर फिसल गया और उस दिन वहा कोई भी नहीं था। मैं जैसे ही छत पर गया तो मैंने देखा कि वह गिरी पड़ी है मुझे बहुत ही हंसी आई है और मैं हंसने लगा। वह मुझे कहने लगी कि तुम मुझे उठाओगे नहीं मैंने उसे कहा कि तुम्हारे काम ही ऐसे हैं।

तुम्हें उठा कर कोई फायदा नहीं लेकिन वह मेरे हाथ जोड़ने लगी और मैं उसके पास जैसे ही गया तो उसकी सलवार नीचे से फटी हुई थी। मैंने उसके सलवार को और फाड़ दिया अब मुझे उसकी बड़ी-बड़ी चूतडे दिखाई देने लगी। मेरा मन खराब हो गया उस समय गर्मी भी बहुत तेज हो रही थी लेकिन छत में कोई नहीं था।

सब लोग अपने घरों में सो रहे थे मैंने अपनी जीभ को उसके बड़ी-बड़ी चूतडो के बीच में डाल दिया और उसे चाटना शुरू किया। मैं बहुत ही अच्छे से उसकी गाड को चाटता जाता और वह बहुत ही उत्तेजित हो रही थी।

मुझे बहुत आनंद आ रहा था जब मैं उसकी बड़ी-बड़ी चूतडो को चाट रहा था। उसमें से कुछ चिपचिपा भी बाहर निकलने लगा और मैंने अपने लंड पर थूक लगाया और उसकी गांड के अंदर अपने लंड को घुसा दिया।

जिससे कि वह बड़ी तेजी से चिल्लाने लगी और मैं ऐसे ही उसे चोद रहा था मुझे बहुत ही गुस्सा भी आ रहा था उस पर और मज़ा भी आने लगा। मैंने उसकी सलवार को पकड़ा और थोड़ा सा फाडा तो उसकी चूतडे मुझे अब पूरी दिखने लग गई। मैं

उसे बड़ी ही तीव्र गति से चोद रहा था जिससे कि मेरा लंड रगड़ने लगा और रगड़ते रगड़ते मेरे लंड से भी खून आने लगा और उसकी गांड से भी खून आ रहा था लेकिन मुझे बहुत ही मजा आने लगा।

मेरे कंधे पर मेरा कॉलेज का बैग था मैंने उसे तुरंत ही फेंकते हुए। अब उसे बड़ी तीव्र गति से धक्के देना शुरू किया जिससे कि उसके गले से आवाज आती और वह मुझे कहने लगे कि तुम आज मुझे बेहोश कर कर रहोगे।

जैसे ही उसने यह बात कही तो मैंने उसे और कस कर पकड़ लिया और इतनी तीव्र गति से चोदना शुरू किया कि उसके गले से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी। उसकी बड़ी बड़ी चूतडे मेरे लंड से टकराकर धराशाही हो जाती।

अब उसे भी बहुत मज़ा आने लगा और वह भी अपनी चूतड़ों को मुझसे मिलाने लगी। जैसे ही उसने अपनी चूतड़ों को मेरे लंड पर सटाना शुरु किया तो मेरा लंड और मोटा होता चला गया और मुझे बहुत ही मजा आने लगा।

वह मुझे कहने लगी कि तुम तो बहुत ही अच्छे से मेरी गांड मार रहे हो। ऐसी गांड अगर गुलाटी जी भी मेरी मारे तो मुझे बहुत ही मजा आ जाए लेकिन गुलाटी जी का तो अब खड़ा भी नहीं होता है और उनके अंदर वह ताकत भी नहीं रह गई है। यह सुनकर मैंने और ज्यादा उसे चोदना शुरू कर दिया और उसकी गांड में अपने लंड को घुसा रहा था जैसे उसकी गांड में कोई सुला घुस गया हो।

मुझे बडा मजा आ रहा था और जब वह बहुत चिल्ला रही थी तो मुझे ऐसा लग रहा था। जैसे मैं गुलाटी जी की पत्नी क चूतडो के अंदर ही घुस जाऊ लेकिन उसकी चूतड़ों की गर्मी से मेरा वीर्य निकल गया और जैसे ही मेरा वीर्य गिरा तो उसकी चूतडे बहुत ज्यादा नरम हो गई। मैंने अपने लंड को बड़े आराम से बाहर निकाला।

अब वह छत में ही लेट गई और मैं बहुत ज्यादा पसीना-पसीना हो चुका था वह मुझे कहने लगे कि अब से तुम मेरी गांड मार दिया करो और मैं कभी भी तुम्हारे घरवालों को कुछ भी नहीं कहूंगी।

मैंने उसे कहा कि तुम्हारी गांड तो बहुत ही मजेदार है मैं जरूर तुम्हारी गांड मारा करूंगा। वह मुझे छत से कई बार इशारा कर देती है और मैं छत में जाकर उसकी गांड मार आता हूं।

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